चतुराई क्या कीजिए, जो नहिं शब्द समाय ।
वह चतुराई हि किस अर्थ की जब सदगुरू के सदज्ञान के उपदेश ही हृदय में नहीं समाते । उस प्रवचन का क्या लाभ ? जिस प्रकार करोडो की बात तोता सोख्ता पढता है परन्तु अवसर मिलते ही बिल्ली उसी (तोते को) खा जाती है । ठीक उसी प्रकार सदगुरू हो ज्ञानंरुपी प्रवचन सुनकर भी अज्ञानी मनुष्य यूं ही तोते की भांति मर जाते हैं ।
साधु आवत देखि के, मन में कर मरोर ।
सो तो होसी चुहरा, बसै गांव की ओर ।।
साधु को आता हुआ देखकर जिस व्यक्ति के मन मरोड उठती है अर्थात साधु जन का आगमन भार स्वरूप प्रतीत (महसूस) होता है, वह अगले जन्म में चुडे चान्दाल का जन्म पायेगा और गांव के किनारे जाकर रहेगा । सन्तों से उसकी भेंट नहीं होगी ।
तन को जोगी सब करै, मन को करै ल कोय ।
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय ।।
ऊपरी आवरण धारण करके हर कोई योगी बन सकता है किन्तु मन की चंचलता को संयमित करके कोई योगी नहीं बनता । यदि मन को संयमित करके योगी बने तो सहजरूप में उसे समस्त सिद्धीयां प्राप्त हो जायेंगी ।
मांग गये सो मर रहे, मरै जु मांगन जांहि ।
तिनतैं पहले वे मरे, होत करत है नाहिं ।।
जो किसी के घर कुछ मांगने गया, समझो वह मर गया और जो मांगने जायेगा किन्तु उनसे पहले वह मर गया जो होते हुए भी कहता है कि मेरे पास नहीं है ।
कबीर कुल सोई भला, जा कुल उपजै दास ।
जा कुल दास न ऊपजै, सो कुल आक पलास ।।
कबीर दास जो कहते हैं की उस कुल में उत्पन्न होना अति उतम है जिस कुल में गुरु भक्त और शिष्य उत्पन्न हुए हों किन्तु जिस कुल में भक्त उत्पन्न नहीं होता उस कुल में जन्म लेना मदार और पलास के पेड के समान निरर्थक है ।
पढि पढि के पत्थर भये, लिखि भये जुईंट ।
कबीर अन्तर प्रेम का लागी नेक न छींट ।।
कबीर जी ज्ञान का सन्देश देते हुए कहते हैं कि बहुत अधिक पढकर लोक पत्थर के समान और लिख लिखकर ईंट के समान अति कठोर हो जाते हैं । उनके हृदय में प्रेम की छींट भी नहीं लगी अर्थात् ‘प्रेम’ शब्द का अभिप्राय ही न जान सके जिस कारण वे सच्चे मनुष्य न बन सके ।
शब्द जु ऐसा बोलिये, मन का आपा खोय ।
ओरन को शीतल करे, आपन को सुख होय ।।
ऐसी वाणी बोलिए जिसमें अहंकार का नाम न हो और आपकी वाणी सुनकर दुसरे लोग भी पुलकित हो जाँ तथा अपने मन को भी शान्ति प्राप्त हो ।
जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय ।
सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय ।।
जंत्र मंत्र का आडम्बर सब झूठ है, इसके चक्कर में पडकर अपना जीवन व्यर्थ न गँवाये । गूढ ज्ञान के बिना कौवा कदापि हंस नहीं बन सकता । अर्थातः- दुर्गुण से परिपूर्ण आज्ञानी लोग कभी ज्ञानवान नहीं बन सकते ।
मन मोटा मन पातरा, मन पानी मन लाय ।
मन के जैसी ऊपजै, तैसे ही हवै जाय ।।
यह मन रुपी भौरा कहीं बहुत अधिक बलवान बन जाता है तो कहीं अत्यन्त सरल बन जाता है । कहीं पानी के समान शीतल तो कहीं अग्नि के समान क्रोधी बन जाता है अर्थात जैसी इच्छा मन में उपजत हैं, यह वैसी ही रूप में परिवर्तित हो जाता हैं ।
कबीर माया पापिनी, लोभ भुलाया लोग ।
पुरी किनहूं न भोगिया, इसका यही यही बिजोग ।।
कबीर जो कहते हैं कि यह माया पापिनी है । इसने लोगों पर लोभ का परदा डालकर अपने वश में कर रखा है । इसे कोई भी पुरी तऱ्ह भोग नहीं पाया अर्थात जिसने जितना भी भोगा वह अधुरा ही रह गया और यही इसका वियोग है ।
काम क्रोध मद लोभ की, जब लग घट में खान ।
कबीर मूरख पंडिता, दोनो एक समान ।।
संत शिरोमणी काबीर जी मूर्ख और ज्ञानी के विषय में कहते हैं कि जब तक काम, क्रोध, मद एवम् लोभ आदि दुर्गुण मनुष्य के हृदय में भरा है तब तक मूर्ख और पंडित (ज्ञानी) दोनों एक समान है । उपरोक्त दुर्गुणों को अपने हृदय से निकालकर जो भक्ति ज्ञान का अवलम्बन करता है वही सच्चा ज्ञानी है।
झूठा सब संसार है, कोऊ न अपना मीत ।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत ।।
यह छल कपट, मोह, विषय आदि सब झूठे हैं । यहाँ पर सभी स्वार्थीं है कोई अपना मित्र नहीं है । जिसने राम नाम रुपी अविनाशी परमात्मा को जान लिया वह भवसागर से पार होकर परमपद को प्राप्त होगा । यही परम सत्य है ।
बिरछा कबहुं न फल भखै, नदी न अंचवै नीर ।
परमारथ के कारने, साधू धरा शरीर ।।
वृक्ष अपने फल को स्वयं नही खाते, नदी अपना जल कभी नहीं पीती । ये सदैव दुसरो की सेवा करके प्रसन्न रहते हैं उसी प्रकार संतों का जीवन परमार्थ के लिए होता है अर्थात् दुसरो का कल्याण करने के लिए शरीर धारण किया है ।
आंखों देखा घी भला, ना मुख मेला तेल ।
साधु सों झगडा भला, ना साकट सों मेल ।।
आँखों से देखा हुआ घी दर्शन मात्र भी अच्छा होता है किन्तु तेल तो मुख में डाला हुआ भी अच्छा नहीं होता । ठीक इसी तऱह साधु जनों से झगडा कर लेना अच्छा है किन्तु बुद्धिहीन से मिलाप करना उचित नहीं है ।
साधु बिरछ स्त ज्ञान फल, शीतल शब्द विचार ।
जग में होते साधु नहीं, जर मरता संसार ।।
साधु जन सुख प्रदान करने वाले वृक्ष के समान है और उनके सत्यज्ञान को अमृतमयी फल समझकर ग्रहण करो । सधुओं के शीतल शब्द, मधुर विचार हैं । यदि इस संसार में साधु समझकर नहीं होते तो संसार अज्ञान की अग्नि में जल मरता ।
आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह ।
यह तीनों तबही गये, जबहिं कहा कछु देह ।।
अपनी आन चली गई, यान सम्मान भी गया और आँखों से प्रेम की भावना चली गयी । ये तीनों तब चले गये जब कहा कि कुछ दे दो अर्थात आप जब कभी किसी से कुछ माँगोगे । अर्थात् भिक्षा माँगना अपनी दृष्टी से स्वयं को गिराना है अतः भिक्षा माँगने जैसा त्याज्य कार्य कदापि न करो ।
कबीर संगत साधु कि, नित प्रिती कीजै जाय ।
दुरमति दूर बहावासी, देसी सुमति बताय ।।
संत कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जन लोगों की संगत में प्रतिदिन जाना चाहिए । उनके सत्संग से र्दुबुद्धि दूर हो जाता है और सद्ज्ञान प्राप्त होता है ।
कागा कोका धन हरै, कोयल काको देत ।
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनो करि लेत ।।
कौवा किसी का धन नहीं छीनता और न कोयल किसी को कुछ देती है किन्तु कोयल कि मधुर बोली सबको प्रिय लगती है । उसी तरह आप कोयल के समान अपनी वाणी में मिठास का समावेश करके संसार को अपना बना लो ।
कर्म फंद जग फांदिया, जबतब पूजा ध्यान ।
जाहि शब्द ते मुक्ति होय, सो न परा पहिचान ।।
कर्म के फंदे में फसे हुए संसार लोक भोग विलास एवम् कामनाओं के वशी भूत होकर जब तब पूजा पाठ करना भूल गये है किन्तु जिस सत्य स्वरूप ज्ञान से मोक्ष प्राप्त हो है उसे पहचान कि नही सके ।
राजपाट धन पायके, क्यों करता अभिमान ।
पडोसी की जो दशा, सो अपनी जान ।।
राज पाट सुख सम्पत्ती पाकर तू क्यों अभिमान करता है । मोहरूपी यह अभिमान झूठा और दारूण दुःख देणे वाला है । तेरे पडोसी जो दशा हुई वही तेरी भी दशा होगी अर्थात् मृत्यु अटल सत्य है । एक दिन तुम्हें भी मरना है फिर अभिमान कैसा ?
कहा भरोसा देह, बिनसी जाय छिन मांहि ।
सांस सांस सुमिरन करो और जतन कछु नाहिं ।।
एस नश्वर शरीर का क्या भरोसा, क्षण मात्र में नष्ट हो सकता है अर्थात एक पल में क्या हो जाय, कोई भरोसा नहीं । यह विचार कर हर सांस मे सत्गुरू का सुमिरन करो । यही एकपात्र उपाय है ।
जिनके नाम निशान है, तिन अटकावै कौन ।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया आवा गौन ।।
जिस मनुष्य के जीवन मी सतगुरु के नाम का निशान है उन्हें रोक सकाने की भला किसमें सामर्थ्य है, वे परम पुरुष परमात्मा के ज्ञान रुपी भंडार को पाकर जन्म मरण के भवरूपी सागर से पार उतरकर परमपद को पाते है ।
बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय ।
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखो तत्व लगाय ।।
मन रुपी मृग बिना सिर का है जो स्वच्छद रुपी से दूर दूर तक विचरण करता है । इस सद्गुरू के ज्ञान रुपी उपदेश की दोरी से बांधकर आत्म तत्व की साधन में लागाओ जो कि कल्याण का एक मात्र मार्ग है ।
सांच कहूं तो मारि हैं, झुठै जग पतियाय ।
यह जगकाली कूतरी, जो छेडै तो खाय ।।
संसार के प्राणियों के विषय में कबीर दास जी कहते हैं कि सत्य बोलने पर लोग मारने दौडते हैं और झुठ बोलने पर बडी आसानी से विश्वास कर लेते हैं । यह संसार काटने वाली काळी कुतिया के समान है जो इसे छेडता है उसे हि काट लेती है ।
सांचे को सांचा मिलै, अधिका बढै सनेह ।
झूठे को सांचा मिलै, तड दे टुटे नेह ।।
सत्य बोलने वाले को सत्य बोलने वाला मनुष्य मिलता है तो उन दोनों के मध्य अधिक प्रेम बढता है किन्तु झूठ बोलने वाले को जब सच्चा मनुष्य मिलता है तो प्रेम अतिशीघ्र टूट जाता है क्योंकि उनकी विचार धारायें विपरीत होती है ।
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